हरियाणा सरकार का बड़ा फैसला: PG करने वाले सरकारी डॉक्टरों को मिली राहत, बॉन्ड नियमों में अहम बदलाव
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी दूर करने और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए नई नीति लागू

चंडीगढ़: हरियाणा सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सरकारी सेवा में रहते हुए पोस्टग्रेजुएट (PG) मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने वाले डॉक्टरों के लिए लागू बॉन्ड नीति में संशोधन किया है। नई व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की कमी को दूर करना और प्रदेश के अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव डॉ. सुमिता मिश्रा ने बताया कि संशोधित नीति के तहत अब क्लीनिकल स्पेशलिटी में पीजी डिग्री पूरी करने वाले सरकारी डॉक्टरों को मेडिकल एजुकेशन बॉन्ड भरने की आवश्यकता नहीं होगी। वे अपनी मूल सेवाओं में कार्यरत रहकर जनता को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर सकेंगे।
क्लीनिकल स्पेशलिस्ट डॉक्टरों को सीधा लाभ
नई नीति के अनुसार, सरकारी सेवा के दौरान क्लीनिकल विषयों में पोस्टग्रेजुएट डिग्री प्राप्त करने वाले चिकित्सकों को पहले की तरह अतिरिक्त शैक्षणिक बॉन्ड प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा। इससे डॉक्टरों को उच्च शिक्षा लेने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ सेवाओं की उपलब्धता बढ़ेगी।
सरकार का मानना है कि इस निर्णय से प्रदेश के विभिन्न जिलों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती और स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा।
2022 की नीति में किया गया संशोधन
यह बदलाव राज्य सरकार की वर्ष 2022 में लागू उस नीति में किया गया है, जिसके तहत आरक्षित कोटे के माध्यम से सरकारी सेवा में कार्यरत डॉक्टरों को पीजी शिक्षा का अवसर दिया जाता था। नए संशोधन के बाद नीति को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक व्यावहारिक बनाया गया है।
नॉन-क्लीनिकल और पैरा-क्लीनिकल विषयों के लिए अलग प्रावधान
सरकार ने नॉन-क्लीनिकल और पैरा-क्लीनिकल विषयों में अध्ययन करने वाले डॉक्टरों के लिए अलग व्यवस्था रखी है। ऐसे चिकित्सक जो मेडिकल कॉलेजों में आरक्षित कोटे का लाभ लेकर प्री-क्लीनिकल या पैरा-क्लीनिकल विषयों में पीजी पाठ्यक्रम पूरा करेंगे, उन्हें चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग के संस्थानों में कम से कम तीन वर्ष तक शिक्षण सेवाएं देनी होंगी।
इस प्रावधान का उद्देश्य मेडिकल कॉलेजों में योग्य शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ाना और चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है।



